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Bla, bla, bla on FB / WhatsApp...

वो बातें जिसका मतलब कुछ नहीं निकलता पर होती और की जाती हैं उन बातों को "औरतों" की बातें कहा जाता है - यह सब को पता है और जग ज़ाहिर भी है, किसी को इस पर शक नहीं होना चाहिए...
और आज हमारा FB / WhatsApp पर यही हाल हो गया है - हम सब ना चाह कर भी "अमुक बातों" का हिस्सा हो गए है, जिसकी खिल्ली हमारे पूर्वज उड़ाया करते थे... आज हम FB पर आते हैं bla, bla, करते है और खुश हो जाते हैं - क्योंकि:
हम कुछ करने लायक़ बचे / रहे ही नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे पुराने वक़्त में घर की house wife हुआ करती थीं... सब कुछ जानते हुए भी उनका समाज तथा इसके बदलाव में कोई हस्तछेप नहीं होता था...
मैने ऊपर जो लिखा है - पढने में शायद अटपटा सा लगे - पर है चिंतन का विषय - इसे एक बार और पढे और सोंचे... ये क्या कर रहे है हम सब लोग... ?
नोट: "औरतों" और "house wife" जैसे शब्दों को प्रयोग तथ्य को समझाने हेतु केवल उदधारण के रूम में किया गया है, - कृप्या कोई इसे personal ना ले... धन्यवाद!

(c) zafar ki khabar

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पूरी दुनिया इंसानियत के लिए है और यह किताब भी इंसान और इंसानियत की बात बताती है पर इस किताब को इंसान से दूर कर दिया गया है, अफ़सोस! कुरान कहता है या तो क्रिमिनल हो जाओ या मुसलमान हो जाओ. जो क्रिमिनल होगा वो कभी मुसलमान नहीं हो सकता और मुस्लमान कभी क्रिमिनल नहीं हो सकता. जो कहने को मुसलमान है और क्रिमिनल है वो सिर्फ और सिर्फ "शैतान" है मुसलमान नहीं. कहा जाता है क़ुरान हिफ्ज़ कर लो - जबकि होना यह चाहिए की इसके मानी (मतलब) को समझा जाये. जिससे पता चलेगा कि एक इंसान अपनी ज़िन्दगी कैसे जिए. क़ुरान में क़रीब 6,666 आएतें है जिसमे से करीब 06 नमाज़; 06 रोज़ा और 06 ही हज के बारे में हैं. इसके इलावा सारी की सारी सिर्फ और सिर्फ इंसानियत और इंसानी ज़िन्दगी से वाबस्ता हैं. पर यह सच्चाई हमारे धर्म के ठेकेदारों द्वारा कभी किसी को सही नहीं बताई जाती है. उपरोक्त नमाज़, रोज़ा एवम् हज के पीछे क्या वजह है नहीं बताये/समझाए जाते है. बस कहा जाता है नमाज़ पढो, रोज़ा रखो, ज़िन्दगी में एक बार हज ज़रूर करो नहीं तो "गुनाह" पाओगे, गुनाह, गुनाह, गुनाह - और हम इस लफ्ज़ "गुनाह" के डर से आगे कु...