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समय के साथ-साथ बदलाव ज़रूरी

समय के साथ बदलाव ज़रूरी है और बदलाव पर चर्चा भी. क्योंकि सब जानते है बदलाव प्रकृति का नियम भी है - इतिहास गवाह है जिस भी सभ्यता ने अपने को समय के साथ नहीं बदला वो लुप्त हो गई. 

हम न बदले तो हमारा भी यही हाल होगा. यहाँ यह भी कहना ज़रूरी है कि लुप्त होने वाली सभ्यता किसी भी मामले में हम से कम विकसित नहीं थी. चाहे वो सभ्यता हड़प्पा, मोहन्जोद्रो, मेसोपोटामिया या फिर मिस्र... 

यह एक गहन चिंतन का विषय है...

(c) ज़फ़र की ख़बर

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क़ुरान और इस्लाम

पूरी दुनिया इंसानियत के लिए है और यह किताब भी इंसान और इंसानियत की बात बताती है पर इस किताब को इंसान से दूर कर दिया गया है, अफ़सोस! कुरान कहता है या तो क्रिमिनल हो जाओ या मुसलमान हो जाओ. जो क्रिमिनल होगा वो कभी मुसलमान नहीं हो सकता और मुस्लमान कभी क्रिमिनल नहीं हो सकता. जो कहने को मुसलमान है और क्रिमिनल है वो सिर्फ और सिर्फ "शैतान" है मुसलमान नहीं. कहा जाता है क़ुरान हिफ्ज़ कर लो - जबकि होना यह चाहिए की इसके मानी (मतलब) को समझा जाये. जिससे पता चलेगा कि एक इंसान अपनी ज़िन्दगी कैसे जिए. क़ुरान में क़रीब 6,666 आएतें है जिसमे से करीब 06 नमाज़; 06 रोज़ा और 06 ही हज के बारे में हैं. इसके इलावा सारी की सारी सिर्फ और सिर्फ इंसानियत और इंसानी ज़िन्दगी से वाबस्ता हैं. पर यह सच्चाई हमारे धर्म के ठेकेदारों द्वारा कभी किसी को सही नहीं बताई जाती है. उपरोक्त नमाज़, रोज़ा एवम् हज के पीछे क्या वजह है नहीं बताये/समझाए जाते है. बस कहा जाता है नमाज़ पढो, रोज़ा रखो, ज़िन्दगी में एक बार हज ज़रूर करो नहीं तो "गुनाह" पाओगे, गुनाह, गुनाह, गुनाह - और हम इस लफ्ज़ "गुनाह" के डर से आगे कु...