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समय के साथ-साथ बदलाव ज़रूरी

समय के साथ बदलाव ज़रूरी है और बदलाव पर चर्चा भी. क्योंकि सब जानते है बदलाव प्रकृति का नियम भी है - इतिहास गवाह है जिस भी सभ्यता ने अपने को समय के साथ नहीं बदला वो लुप्त हो गई.  हम न बदले तो हमारा भी यही हाल होगा. यहाँ यह भी कहना ज़रूरी है कि लुप्त होने वाली सभ्यता किसी भी मामले में हम से कम विकसित नहीं थी. चाहे वो सभ्यता हड़प्पा, मोहन्जोद्रो, मेसोपोटामिया या फिर मिस्र...  यह एक गहन चिंतन का विषय है... (c) ज़फ़र की ख़बर

मालदा में शर्मसार हुई इंसानियत

दुनिया तो बदनाम कर ही रही है "मुसलमानों" को या यह कहो "इस्लाम" को पर अब तो मालदा में उपद्रव कर के (so called) हिन्दुस्तानी मुसलमानों ने भी "इस्लाम" को बदनाम किया है - इससे और कोई नहीं सिर्फ और सिर्फ इंसानियत शर्मसार हुई है, या खुदा जो भी इसमे शामिल है उन्हे कभी माफ़ न करना. न जाने कब समझ आएगा लोगों को कि उपर वाले ने सदा ही "इंसानियत" को महफूज़ और बरक़रार रखना चाहा है, चाहे दौर कोई सा भी रहा हो.                          (c) ज़फ़र की ख़बर

हमारे बहादुर सैनिक - असलहे और बुलेट प्रूफ जैकेट

नमो जी, यह मेरी गुज़ारिश समस्त जनता की ओर से है कि हमारे बहादुर सैनिकों को जो पाकिस्तान सिमाँ पर है, को ताज़ातरीन असलहे और बुलेट प्रूफ जैकेट जल्द से जल्द दिलवाए. और हाँ अगर सरकार के पास पैसों की कंमी है तो हम जनता साथ है इस लिए, बस आपका इशारा काफ़ी होगा - हम एक वक़्त कम खा लेंगे पर बहादुरों को इस तरह मरने नहीं देंगे. जय हिन्द - जय भारत - जय जय. (c) ज़फ़र की ख़बर  

बुलेट ट्रेन और हम....

1000 राजधानी सुपर फ़ास्ट ट्रेनों की बलि चड़ा कर आएगी - सिर्फ और सिर्फ एक बुलेट ट्रेन... वो भी सिर्फ मुंबई से अहमदाबाद को जोड़ेगी अपनी रफ़्तार से, और ... कर्ज़दार होगा पूरा का पूरा देश. बीबीसी ने भी ट्वीट किया है कि: "कोई तो इस सरकार को १ लाख करोड की फिजूलखर्ची से रोके" पर जिद है "कुछ भी करना पड़े" बुलेट ट्रेन तो आएगी ही... अरे और वादों की तरह इस जुमले को भी क्यों नहीं भुला देते, क्यों लगे हो जनता को और गर्त मे ले जाने पर....                              (c) ज़फ़र की ख़बर 

संस्कृतियों का संगम, भारत और धर्म आधारित राजनिती...

भारत जैसा देश , जो अनेक प्रकार की संस्कृति का संगम है , में धर्म के आधार पर राजनिती करने के कारण बीजेपी नुकसान ही उठा रही है, यह भूल कर कि सत्ता जो हासिल हुई थी वह ' विकास ' के नाम पर बदलाव की राजनीति के आधार पर हुई थी न की ' धर्म ' के नाम पर.  यह अब जग ज़ाहिर भी हो गया है , जिसका परिणाम गुजरात के चुनाव में भी दिखा है , जहाँ इनके द्वारा "कांग्रेस मुक्त भारत" के नारे को भी नाकारा गया है. गुजरात मॉडल का सच  भी,  अब बाहर आ रहा है , जनता इनको समझ रही है और अपना नजरिया दिखा रही है. सब से प्रमुख बात तो यह है कि बीजेपी, आज कल अंतर्कलह के दौर से गुज़र रही है. अंदर ही अंदर गुटबाजी भी हो गई है. एक धड़ा है जो सत्ता में अग्रिम दिखने वाले चेहरों को एक सिरे से नकार चूका है क्योंकि उसे भी नज़रअंदाज़ किया गया है अब तक. यहाँ यह बात भी गौर करने वाली है कि ये वह लोग है जिन्होने नमो को सत्ता में यहाँ तक पहुचाया. सब इस बात को ज़रूर मानते होंगे कि जो किसी को उरूज दे सकता है तो वह समय आने पर वहीं पंहुचा भी सकता है , जहाँ से लाया था. आम जनता ने नमो को १२ साल देने की बात सोंची थी , ...

लालू जी यह क्या...

अरे, यह क्या किया... कहा गई लालू जी आपकी दूरंदेशी, फिर पड़ गए परिवार वाद में... आप ये क्यों नहीं सोंचते कि राष्ट्रीय तौर पर सत्ता का दूसरा विकल्प बनने के बीच आपकी यही सोंच रोड़ा बनेगी... औरों का क्या है - लौट जाएँगे अपने पुराने दोस्तों के साथ...                                (c) ज़फ़र की ख़बर